हुई प्यास से अधमरी, काला पड़ा शरीर।
दिल्ली के दरबार में, नदिया माँगे नीर॥
लिये होंठ सूखे, समय पूछे यही सवाल।
किधर गया, कल था यहाँ पानी वाला ताल॥
ना जाने किस मोड़ पर चेतेगा इंसान।
पानी-पानी हो रही, पानी की पहचान॥
सार्वजनिक नल बंद हैं, प्याऊ हैं लाचार।
लगे हुए हैं हर तरफ, पानी के बाज़ार॥
नदिया अमृत बाँटकर, खुद करती विषपान।
पता नहीं किस मोड़ पर दे दे अपनी जान॥
किस विकास के खुल गए, यारों आज किवाड़।
डरे-डरे हतप्रभ खड़े, जंगल, नदी, पहाड़॥
किस विकास की दौड़ में, रहा न कुछ भी याद।
जीव-जन्तु, जंगल सभी, पानी के अनुवाद॥
जीवन एक निबंध-सा, यों पाये विस्तार।
पानी ही प्रस्तावना, पानी उपसंहार॥
हरी-भरी रचना सभी, ठहर, समझ, पढ़, देख।
कितने पानीदार हैं, पानी के आलेख॥
नित पानी का दायरा, हुआ अगर यूँ तंग।
पानी की खातिर न हो, यारो अगली जंग॥
राजन पर उत्तर नहीं, हतप्रभ है बेताल।
कहाँ शहर से गुम हुए, सारे पोखर-ताल ॥
नदिया कहे कराह के, दे ले अब तो घाव।
कभी नाव में है नदी, कभी नदी में नाव॥
नदिया चली पहाड़ से, मन में ले उल्लास।
जब आई मैदान में, पग-पग पसरी प्यास॥
जल ये जल-जलकर कहे, चेत अरे इंसान।
तरसाऊँगा कल तुझे ले मत मेरी जान॥
खोदे गए मकान जब, कुछ नगरों के पास।
हर मकान की नींव में थी पोखर की लाश॥
जल ने मल में डूबकर, दिया मनुज को शाप।
'दुख झेलेंगी पीढ़ियाँ, जल-जल करते जाप॥'
सागर बोला-री नदी! कैसी थी वो राह?
नदी सुबकने लग गई, मुँह से निकली आह॥
जल जहरीला हो गया, पी-पीकर तेज़ाब।
ऐ विकास! तू धन्य है, माँगे कौन जवाब॥
जल पहुँचा पाताल में, नभ पर पहुँचे लोग।
काली नदिया बह रही, लेकर अनगिन रोग॥
हम नदिया के तट खड़े, ले आँखों में नीर।
प्यासी नदिया की विवश बाँट रहे तकदीर॥
खेल अनोखे खेलता, दिल्ली का दरबार।
आँखों में पानी नहीं, किससे करें गुहार॥
Saturday, March 3, 2012
जन्मभूमि sabse upar
सुरसरि सी सरि है कहा मेरू सुमेर समान।
जन्मभूमि सी भू नहीं भूमंडल में आन।।
प्रतिदिन पूजें भाव से चढ़ा भक्ति के फूल।
नहीं जन्म भर हम सके जन्मभूमि को भूल।।
पग सेवा है जननि की जनजीवन का सार।
मिले राजपद भी रहे जन्मभूमि रज प्यार।।
आजीवन उसको गिनें सकल अवनि सिंह मौर।
जन्मभूमि जलजात के बने रहे जन भौंर।।
कौन नहीं है पूजता कर गौरव गुण गान।
जननी जननी जनक की जन्मभूमि को जान।।
उपजाती है फूल फल जन्मभूमि की खेह।
सुख संचन रत छवि सदन ये कंचन सी देह।।
उसके हित में ही लगे हैं जिससे वह जात।
जन्म सफल हो वार कर जन्मभूमि पर गात।।
योगी बन उसके लिये हम साधे सब योग।
सब भोगों से हैं भले जन्मभूमि के भोग।।
फलद कल्पतरू तुल्य हंै सारे विटप बबूल।
हरि पद रज सी पूत है जन्म धरा की धूल।।
जन्मभूमि में हैं सकल सुख सुषमा समवेत।
अनुपम रत्न समेत हैं मानव रत्न निकेत।।
जन्मभूमि सी भू नहीं भूमंडल में आन।।
प्रतिदिन पूजें भाव से चढ़ा भक्ति के फूल।
नहीं जन्म भर हम सके जन्मभूमि को भूल।।
पग सेवा है जननि की जनजीवन का सार।
मिले राजपद भी रहे जन्मभूमि रज प्यार।।
आजीवन उसको गिनें सकल अवनि सिंह मौर।
जन्मभूमि जलजात के बने रहे जन भौंर।।
कौन नहीं है पूजता कर गौरव गुण गान।
जननी जननी जनक की जन्मभूमि को जान।।
उपजाती है फूल फल जन्मभूमि की खेह।
सुख संचन रत छवि सदन ये कंचन सी देह।।
उसके हित में ही लगे हैं जिससे वह जात।
जन्म सफल हो वार कर जन्मभूमि पर गात।।
योगी बन उसके लिये हम साधे सब योग।
सब भोगों से हैं भले जन्मभूमि के भोग।।
फलद कल्पतरू तुल्य हंै सारे विटप बबूल।
हरि पद रज सी पूत है जन्म धरा की धूल।।
जन्मभूमि में हैं सकल सुख सुषमा समवेत।
अनुपम रत्न समेत हैं मानव रत्न निकेत।।
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